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बेनीपट्टी के धार्मिक स्थलों का नहीं हो रहा संरक्षण

 


बेनीपट्टी (मधुबनी)। बेनीपट्टी अनुमंडल के प्रक्षेत्र में एक से बढ़कर एक पौराणिक देवी स्थल विराजमान है। जिसके संरक्षण करने से पर्यटन स्थल के तौर पर देश पटल पर विख्यात हो सकता है। लेकिन, जनप्रतिनिधियों व पुरातत्व विभाग के उपेक्षा के कारण मंदिर से का सही रख-रखाव नहीं हो पा रहा है। बेशकीमती पत्थर यूंं ही खुले में पड़े रहते है। जिसका संरक्षण करने की बेहद आवश्यकता है। बेनीपट्टी के बाणेश्वर स्थान, गाण्डिवेश्वर स्थान, उच्चैठ की छिन्नमस्तिका वनदुर्गा, हरलाखी के फुलहर स्थान , अकौर की भगवती स्थान सहित कई ऐसे पवित्र स्थल है, जहां पर्यटन स्थल बनाने की संभावना है। परंतु अब तक उच्चैठ के भगवती मंदिर का सौंदर्यीकरण के बाद कुछ भी नहीं किया जा सका। यहां तक ही उच्चैठ भगवती स्थल को अतिक्रमण से भी मुक्त नहीं कराया जा सका है।
               बाणेश्वरनाथ मंदिर का ग्रामीण कर रहे मरम्मत
बेनीपट्टी के बर्री पंचायत में स्थित बाणेश्वरनाथ मंदिर का जीर्णोंद्वार जब जनप्रतिनिधियों एवं विभाग के द्वारा नहीं की गयी तो अब उक्त मंदिर को ग्रामीणों ने जीर्णाद्वार करने का बीड़ा उठाया है। उक्त मंदिर के संबंध में किवदंती है कि महाभारतकाल में जब पांडव अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में थे, तो अर्जुन ने प्यासे गाय को पानी पिलाने के लिए धरती में बाण चलाकर गंगा की धारा निकाल दिया था। जिससे गाय की प्यास बुझायी गयी।
                   महादेव से अर्जुन ने पाया गाण्डीव धनुष
बाणेश्वर नाथ मंदिर से करीब पांच किमी पूर्वी भाग के शिवनगर गांव के उत्तरी भाग में अवस्थित गाण्डीवेश्वर नाथ महादेव मंदिर क्षेत्र के प्रचलित मंदिरों एवं महाभारत सर्किंट से जुड़ी हुई मंदिर है। मंदिर को पर्यटक स्थल बनाने की पुरजोर प्रयास पूर्व सभापति पंडित ताराकांत झा ने की, परंतु अब तक मंदिर को पर्यटक स्थल बनाना तो दूर श्रद्धालुओं के बैठने के लिए एक शेड तक का निर्माण नहीं कराया गया। माना जाता है कि उक्त स्थल पर ही अर्जुन को महादेव ने गाण्डीव धनुष प्रदान किया था। तब से उक्त स्थल को गाण्डीवेश्वर नाथ महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। वहीं बताया जाता है कि मंदिर में करीब सवा पहर साक्षात महादेव विराजमान होते है। इस दौरान मंदिर का शिवलिंग पूर्णरुप से काला स्याह होता है।
                 अकौर में विराजमान है माता भुवनेश्वरी देवी
बेनीपट्टी प्रखंड मुख्यालय से करीब सात किमी उत्तर-पूर्वी कोण पर बसा अकौर गांव अपने आप में ही कई बातों को लेकर प्रचलित है। माना जाता है कि अकौर गांव कभी अकरुर महराज की राजधानी हुआ करती थी। जिसके साक्ष्य आज भी कई जगहों पर मिल चुका है। गांव में खुदाई के समय अक्सर राजमहल में प्रयुक्त होने वालें धातु मिलते है। इस गांव में कई देवी की मूर्ति बरामद हो चुके है। गांव में मुहाने पर ही स्थित है अकौर का माता भुवनेश्वरी देवी की मंदिर। बताया जाता है कि भगवती के दरबार से आज तक कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटा है। संभावना है कि उक्त मंदिर के आसपास खुदाई से कई रहस्य से पर्दा उठ सकता है।
                         

विकास से कोसों दूर गिरिजा स्थान
मुख्यालय से करीब 14 किमी दूर हरलाखी प्रखंड के फुलहर में विराजमान गिरिजा स्थान मंदिर रामायण सर्किंट से जुड़ा हुआ मंदिर है। परंतु सरकार ने उक्त मंदिर की भी सुध अब तक नहीं ली है। गौरतलब है कि गिरिजा स्थान में ही सीता का पहली बार भगवान राम से भेंट हुआ था। जिसकी चर्चा रामायण में भी है। किवंदती है कि उसी समय सीता ने गिरिजा भगवती से भगवान राम जैसा ही पति की कामना की थी।
 


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