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कुछ नाम सिर्फ़ पहचाने नहीं जाते-वे एक एहसास बन जाते हैं। एक ऐसी रौशनी, जो दूर-दराज़ के गांवों में बैठे बच्चों की आंखों में भी चमक पैदा कर दे। मधुबनी ज़िले के बेनीपट्टी प्रखंड के नजरा गांव से उठकर प्रोफेसर इम्तियाज हसन ने जो मुकाम हासिल किया है, वह सिर्फ़ एक शख्स की कामयाबी नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के सपनों की ताबीर है।

बेनीपट्टी प्रखंड के नजरा गांव निवासी स्वर्गीय अब्दुल अहद के पुत्र प्रो. इम्तियाज़ हसन ने अपनी मेहनत, लगन और शिक्षा की ताक़त से यह साबित कर दिया कि हालात चाहे कितने भी विपरीत क्यों न हों, इरादे अगर बुलंद हों तो मंज़िल खुद रास्ता तलाश लेती है। हाल ही में उन्हें भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग Department of Biotechnology द्वारा 805 लाख रुपये का प्रतिष्ठित शोध अनुदान दिया गया है, जो उनकी वैज्ञानिक काबिलियत और भरोसे का एक बड़ा सबूत है। 

DBT की एक विशेष पहल के तहत मिली यह फंडिंग, भारतीय विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Science) और कैंसर अनुसंधान के अग्रणी संस्थानों के साथ साझेदारी में, सिर और गर्दन के कैंसर (HNC) के भारतीय रोगियों में 'कैंसर कैकेक्सिया' (cancer cachexia) की प्रक्रियाओं को समझने के लिए एक अभूतपूर्व सहयोगी परियोजना का समर्थन करती है।

आज वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी दिल्ली के CRIBSC विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं और DDU कौशल केंद्र के डायरेक्टर के रूप में नई पीढ़ी को हुनर और दिशा दे रहे हैं। मगर इस चमकदार मुकाम के पीछे एक लंबा, सादा और जद्दोजहद भरा सफर छुपा है।

गांव के स्कूल से की है प्रारंभिक पढ़ाई

नजरा के मिडिल स्कूल से शुरू हुई तालीम, बसैठा के हाई स्कूल से आगे बढ़ी-जहां संसाधन सीमित थे, लेकिन ख्वाब बेहिसाब। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ से BSc और MSc में गोल्ड मेडल हासिल कर उन्होंने यह जता दिया कि असली काबिलियत किसी माहौल की मोहताज नहीं होती।

बेहतर शिक्षा की तलाश उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) दिल्ली तक ले गई, जहां उन्होंने बायोफिजिक्स में PhD कर एक बार फिर गोल्ड मेडल हासिल किया। यह सिलसिला यहीं नहीं थमा-उनकी काबिलियत ने उन्हें अमेरिका, जापान, कोरिया, चीन और सऊदी अरब जैसे देशों तक पहुंचाया, जहां उन्होंने अपने शोध से अंतरराष्ट्रीय पहचान कायम की।

600 से अधिक शोध पत्र, हजारों सिटेशन और एक मजबूत अकादमिक कद-ये सब उस अथक मेहनत के गवाह हैं, जो उन्होंने सालों तक बिना थके जारी रखी। और यही वजह है कि आज प्रो. इम्तियाज़ हसन का नाम दुनिया के टॉप 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों में शुमार किया जाता है-जो किसी भी वैज्ञानिक के लिए बेहद बड़ा सम्मान माना जाता है।

उनकी एक और बड़ी पहचान यह है कि उनके मार्गदर्शन में कई शोधार्थी PhD पूरी कर चुके हैं। उनके सानिध्य में तैयार हुए ये विद्यार्थी आज देश और दुनिया के विभिन्न संस्थानों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं-यानी प्रो. हसन सिर्फ़ खुद एक रोशनी नहीं, बल्कि रोशनियां तैयार करने वाले उस्ताद भी हैं।

हाल ही में मिला DBT ग्रांट उनके सफर का एक नया और अहम पड़ाव है। इस प्रोजेक्ट के तहत वे भारतीय सिर और गर्दन के कैंसर से जूझ रहे मरीजों में तेजी से घटते वज़न, यानी ‘कैंसर कैकेक्सिया’, के कारणों की गहराई से जांच करेंगे। यह शोध भविष्य में इलाज के नए रास्ते खोल सकता है और लाखों मरीजों के लिए राहत की वजह बन सकता है।

प्रो. इम्तियाज़ हसन की यह कहानी हमें यह सिखाती है कि महानता किसी बड़े शहर की जागीर नहीं होती-वह तो उस जुनून की देन होती है, जो एक छोटे से गांव के बच्चे को भी आसमान छूने का हौसला दे देता है।



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