बेनीपट्टी(मधुबनी)। मिथिलांचल का लोक पर्व कोजगरा धूमधाम से मनाया जाएगा। मिथिला के नवविवाहित दुल्हों के घर कोजगरा को लेकर उत्सवी माहौल देखा जा रहा है। घरों में दूल्हे के ससुराल से आने वाले भाड़ को लेकर चर्चाएं होनी शुरू हो चुकी है। रिश्तेदारों और मेहमानों के आने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। वहीं दूसरी ओर, कोजगरा को लेकर बाजार में भी चहल-पहल बढ़ गई है। बेनीपट्टी में जहां-तहां मखाना की दुकानें सज चुकी है। कोजगरा के अवसर पर समाज के लोगों में मखाना-बताशा और पान बांटने की परंपरा है।

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कोजगरा पर्व आश्विन मास की पूर्णिमा यानी कि शरद पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन प्रदोष काल में माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। साथ ही नवविवाहित दूल्हे का चुमावन कर नवविवाहितों के समृद्ध और सुखमय जीवन के लिए प्रार्थना की जाती है। इसके बाद लोगों के बीच मखाना-बताशा, पान आदि बांटे जाते हैं। माना जाता है कि कोजगरा की रात लक्ष्मी के साथ ही आसमान से अमृत वर्षा होती है। पूरे वर्ष में शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा सबसे अधिक शीतल और प्रकाशमान प्रतीत होते हैं। इन सब के बीच यह पर्व सामाजिक समरसता का भी प्रतीक माना जाता है।

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मिथिला क्षेत्र के साथ कोजगरा बंगाल में भी काफी उत्साह के साथ मनाया जाता है। बंगाल में इस दिन को लक्ष्मी पूजन का दिन मानते हैं। मिथिलांचल क्षेत्र में कोजगरा की रात का नवविवाहित लोगों के लिए खास महत्व है। इस रात नवविवाहित लोगों के घर उत्सव का माहौल रहता है। दही, धान, पान, सुपारी, मखाना, चांदी से बने कछुआ, मछली, कौड़ी के साथ वर का पूजन किया जाता है। इसके बाद चांदी की कौड़ी से वर और कन्या पक्ष के बीच खेल होता है। इस खेल में जीतने वाले के लिए वर्ष शुभ माना जाता है। पूजा के बाद सगे-संबंधियों और परिचितों के बीच मखाना, पान, बताशे, लड्डू का वितरण किया जाता है। घर के बड़े बुजुर्ग इस दिन दूल्हा को दही लगाकर दीर्घायु और सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद देते हैं। लोग मखाना, पैसे और बताशे लुटाकर उत्सव का आनंद मनाते हैं। इसे विवाह के बाद दूसरा सबसे बड़ा उत्सव माना गया है।


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