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दुर्गा पूजा विशेष : छिन्नमस्तिका के दरबार से खाली नहीं जाते श्रद्धालु

बेनीपट्टी(मधुबनी)। कन्हैया मिश्रा : छिन्नमस्तिका भगवती के दर्शन मात्र से ही लोगों का कल्याण हो जाता है। किवदंती कथा है कि जनकपुर यात्रा के दौरान भगवान श्री राम भी भगवती से आर्शिवाद लेना नहीं भुले थे। जी हां, बेनीपट्टी अनुमंडल मुख्यालय से पांच किमी दूर पश्चिम-उत्तर कोण पर थुम्हानी नदी के किनारे अवस्थित उच्चैठ में विराजमान छिन्नमस्तिका भगवती के यहां आज तक जितने भी श्रद्धालुओं ने मैया के दरबार में श्रद्धा के साथ माथा टेका, उसे कभी खाली हाथ नहीं जाना पडा। किवदंती है कि पांडव पुत्र के अज्ञातवास के दौरान पांडव पुत्रों ने भी वनदुर्गा भगवती की पूजा कर आर्शिवाद प्राप्त किया था। माना जाता है कि उच्चैठ भगवती स्थान में ब्रह्य,अर्जून,राम,इंद्र सहित कई देवताओं ने भी यहां पूजा की है। वहीं महाकवि कालीदास, गोनू झा, महर्षि कपिल, कणाद, गौतम, जेमिनी, पुंडरिक, लोमस सहित कई ऋषि-मुनियों ने आर्शिवाद लिया है।

वैसे तो उच्चैठ मंदिर में श्रद्धालुओं के आने का क्रम लगातार जारी रहता है,लेकिन शारदीय नवरात्रा में नेपाल,झारखंड,प.बंगाल,उडीसा,यूपी सहित कई राज्यों के श्रद्धालु यहां आकर पूजा अर्चना कर मनचाहा वरदान प्राप्त करते है। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच जयकारे से पूरा मंदिर परिसर आध्यात्मिक माहौल से पट जाता है। सिंह पर सवार छिन्नमस्तिका वनदुर्गा भगवती की मूर्ति करीब ढाई फीट की कलात्मक प्रतिमा जो गदा,चक्र,शंख एवं पद्य को धारण की हुई है। चरण में मछली की प्रतिमा भी है।


उच्चैठ स्थित वनदुर्गा की भगवती 51 शक्ति पीठों में शामिल है। महामाया देवी के संबध में प्रकाशित पुस्तकों में वर्णित तथ्यों के अनुसार भारत के कुल 51 शक्ति पीठों में उच्चैठ की भगवती वनदुर्गा सतरहवें स्थान पर है।महाकवि कालीदास का नाम बचपन में कलुआ हुआ करता था। थुम्हानी नदी के किनारे स्थित गुरुकुल में बतौर रसोईया के काम कर रहे कलुआ को भारी बारिस हुई शाम को उच्चैठ भगवती को आरती कर आने का निर्देश गुरु ने दिया। कहा जाता है कि कलुआ ने थुम्हानी नदी को पार कर उच्चैठ भगवती को आरती उतार कर वापस लौटने के क्रम में मैया के मुंह पर आरती से हुई कालिख को पोत कर निशान के तौर पर छोडने के क्रम में कलुआ को भगवती ने साक्षात दर्शन देकर आर्शिवाद मांगने को कहा तो कलुआ ने भगवती से विद्वता के आर्शिवाद लेकर पूरी रात गुरुकुल के सभी शास्त्रों व पुस्तकों को पलट दिया। और देखते ही देखते कलुआ महाकवि कालीदास बन गये। उच्चैठ काॅलेज के बगल में आज भी कालीदास डीह है। जो कई इतिहास को संजोए होने के बाद भी सरकारी उपेक्षाओं का  दंश झेल रहा है।

22 एकड़ में फैला उच्चैठ भगवती स्थान आज अतिक्रमण के कारण दिनों-दिन सिंकुडता जा रहा है। आलम है कि मंदिर परिसर के अलावे सभी भूमि अतिक्रमण के चपेट में आ चुके है। जिसे खाली कराने के लिए किसी भी स्तर पर पहल नहीं किया जा रहा है। वर्ष 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सेवा यात्रा के दौरान पर्यटन विभाग से राशि देकर मंदिर का सौंर्दयीकरण कराने की घोषणा के बाद मंदिर में कुछ निर्माण कार्य शुरू हुआ, मगर अतिक्रमण के कारण मंदिर का विकास पूर्णरुप से नहीं किया जा सका है।


कैसे पंहुचे उच्चैठ स्थान..उच्चैठ भगवती स्थान आने के लिए जिला मुख्यालय मधुबनी से बेनीपट्टी की कई बसें चलती है, जिससे बेनीपट्टी पहुंचा जा सकता है। बेनीपट्टी पहुंचने के बाद दुर्गास्थान जाने के लिए लगभग हर आधे घंटे पर छोटी-बड़ी वाहन मिलती है। जो दुर्गास्थान मंदिर तक श्रद्धालुओं को पहुंचा देती है।


आवागमन बस द्वारा...1. पश्चिम दिशा से :  सीतामढ़ी-पुपरी भाया बेनीपट्टी, उच्चैठ
2. दक्षिण दिशा से : दरभंगा भाया रहिका, बेनीपट्टी, उच्चैठ
3. पुरव दिशा से : लौकही, राजनगर, मधुबनी, बेनीपट्टी, उच्चैठ
4. उत्तर दिशा से : नेपाल तराई सँ जयनगर, रहिका, बेनीपट्टी, उच्चैठ
5. उत्तर पश्चिम दिशा से : मघवापुर, साहरघाट उमगाँव, बेनीपट्टी, उच्चैठ 

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