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ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी, Institute of Objective Studies (IOS), दिल्ली के चेयरमैन और भारत के नामवर बौद्धिक शख्शियत डॉ. मोहम्मद मंज़ूर आलम का आज सुबह दिल्ली के मैक्स अस्पताल में निधन हो गया। बिहार के मधुबनी ज़िले के बेनीपट्टी प्रखंड के रानीपुर गांव में जन्म लेने वाले डॉ मोःम्म्द मंज़ूर आलम गांव से निकलकर दिल्ली के दिल में उम्मत की रहनुमाई का ऐसा दीप जलाया, जिसकी रौशनी सरहदों से आगे तक फैली।  डॉ. मंज़ूर आलम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पीएचडी स्कॉलर रहे। इल्म उनके लिए सिर्फ़ एक डिग्री नहीं, बल्कि एक मिशन था। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी उस तबक़े की आवाज़ बनने में गुज़ारी जिसे समाज अक्सर हाशिये पर छोड़ देता है। उनकी ज़िंदगी इल्म की इबादत, उनके अल्फ़ाज़ हक़ की पुकार और उनका किरदार अख़लाक़ की ज़िंदा तफ़्सीर था।


IOS- सोच की तामीर का मरकज़

1986 में स्थापित Institute of Objective Studies आज भारत के मुसलमानों की बौद्धिक तहरीक का एक मज़बूत मरकज़ बन चुका है। डॉ. आलम की क़ियादत में IOS ने 1,200 से अधिक सेमिनार और कॉन्फ़्रेंस, 400 से ज़्यादा रिसर्च प्रोजेक्ट्स और सैकड़ों किताबों के ज़रिए मुसलमानों को सोचने, सवाल करने और अपने हक़ पहचानने की आदत दी। यह इदारा साबित करता है कि जब फ़िक्र ईमानदार हो, तो इल्म भी इबादत बन जाता है।


तालीम, मीडिया और समाज की तामीर

डॉ. आलम का विज़न सिर्फ़ अकादमिक दुनिया तक सीमित नहीं था। उन्होंने अल-हिंद और फलक टीवी जैसे मीडिया प्लेटफॉर्म्स की तजवीज़ दी ताकि मुसलमानों की बौद्धिक आवाज़ राष्ट्रीय मंच पर सुनी जा सके। तआवुन ट्रस्ट के ज़रिए उन्होंने सेहत, तालीम और समाजी भलाई के कई मंसूबों को अमली जामा पहनाया। रानीपुर गाँव में स्कूल और अस्पताल की बुनियाद रखकर उन्होंने यह साबित किया कि असल तरक़्क़ी महानगरों से नहीं, बल्कि गांवों की मिट्टी से शुरू होती है।


अंतरराष्ट्रीय पहचान

डॉ. मंज़ूर आलम का रिश्ता मुस्लिम दुनिया के बड़े रहनुमाओं से रहा। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहीम, इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक के पहले प्रेसिडेंट डॉ. अहमद मुहम्मद अली और IIIT जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से उनके गहरे ताल्लुक़ात थे। उन्होंने भारतीय मुसलमानों को ग्लोबल बौद्धिक नक़्शे पर एक इज़्ज़तदार मुक़ाम दिलाया।


एक तहरीक, जो आज भी ज़िंदा है

All India Milli Council, Islamic Fiqh Academy, Universal Peace Foundation और Indo-Arab Economic Cooperation Forum जैसी संस्थाएं उनकी उस सोच की गवाही हैं जो तहरीर से आगे बढ़कर तहरीक बन गई।

आज जब उनके बेटे मोहम्मद आलम IOS की ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं, तो ऐसा लगता है कि डॉ. मंज़ूर आलम का ख़्वाब अब अमल की ज़मीन पर उतर रहा है।

डॉ. मंज़ूर आलम सिर्फ़ एक नाम नहीं थे- वह एक तहरीक थे। एक ऐसी तहरीक, जो हमें याद दिलाती है कि जब तक सोच ज़िंदा है, कोई क़ौम हार नहीं सकती।

- जौवाद हसन (स्वतंत्र पत्रकार)


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